मातृछाया जैन महिला संगठन
सेवा, समर्पण और करुणा की एक प्रेरणादायी यात्रा
सेवा और समर्पण की मिसाल, करुणा का दीप जलाया,
‘मातृछाया’ जैन महिला संगठन ने, अनगिनत जीवनों में आशा का उजियारा फैलाया।
यह गाथा है उन निस्वार्थ महिलाओं की, जिन्होंने जीवदया, मानवसेवा, साधर्मिक भक्ति, देवद्रव्य, गुरु भगवंतों की वैयावच्च और जरूरतमंदों के सहायतार्थ अपना जीवन समर्पित किया। यह कहानी है उस सेवाभाव की, जो असहायों को सहारा देता है, पीड़ितों के जीवन में आशा जगाता है और मूक प्राणियों के प्रति करुणा का भाव जागृत करता है।
मातृछाया जैन महिला संगठन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि सेवा, संवेदना, सहयोग और समर्पण की एक सशक्त परंपरा है, जिसने अपने कार्यों से समाज में मानवता और जीवमात्र के प्रति करुणा का संदेश प्रसारित किया है।
स्थापना : एक छोटी शुरुआत, एक महान संकल्प
सन् 1998 में बेंगलूरु की दो धर्मनिष्ठ सुश्राविकाओं, श्रीमती निर्मलादेवी दांतेवाड़िया एवं श्रीमती पवनीदेवी तलावत ने जीवदया और मानवसेवा के पवित्र उद्देश्य से मात्र ₹100 की दानराशि और अटूट संकल्प के साथ मातृछाया की नींव रखी। सीमित संसाधनों से आरंभ हुई यह पहल सेवा के प्रति असीम समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक बनी।
स्थापना के आठ माह पश्चात श्रीमती ललितादेवी नागोरी एवं श्रीमती त्रिशलादेवी कोठारी इस अभियान से जुड़ीं और अपने सहयोग से संगठन को नई मजबूती प्रदान की। दो वर्षों बाद श्रीमती लीलादेवी भंसाली, श्रीमती पुष्पादेवी बाफना, श्रीमती मीनादेवी सोलंकी, श्रीमती पुष्पादेवी नागोरी एवं श्रीमती मधुदेवी दोषी चोपड़ा ने भी इस सेवा-यात्रा में सहभागिता निभाई।
इन नौ समर्पित महिलाओं ने लगभग 15 वर्षों तक निःस्वार्थ भाव से संगठन का संचालन किया। उनके अथक परिश्रम, त्याग और सेवाभाव ने मातृछाया को एक ऐसी पहचान प्रदान की, जिसकी आधारशिला आज भी करुणा, परोपकार और धार्मिक संस्कारों पर टिकी है।

सेवा ही साधना, परोपकार ही हमारा संकल्प
मातृछाया की विशेषता यह है कि यहाँ सेवा केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवनशैली है। संगठन की सदस्याएँ अपनी पारिवारिक और धार्मिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए भी जरूरतमंदों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।
दिन की शुरुआत पशु-पक्षियों को आहार कराने और जीवमात्र के प्रति करुणाभाव व्यक्त करने से होती है। दिनभर की जिम्मेदारियों के पश्चात भी जरूरतमंदों की पीड़ा दूर करने के लिए सदस्याएँ सेवा कार्यों में सक्रिय रहती हैं।
मानवसेवा, जीवदया, साधर्मिक भक्ति, देवद्रव्य, गुरु भगवंतों की वैयावच्च, अनाथालयों, गौशालाओं और जरूरतमंद परिवारों की सहायता जैसे अनेक कार्य संगठन की सेवा-यात्रा के अभिन्न अंग हैं।
जहाँ एक ओर संगठन ने चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में जरूरतमंदों का हाथ थामा, वहीं दूसरी ओर मूक प्राणियों की रक्षा, धार्मिक स्थलों के विकास और समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए भी उल्लेखनीय योगदान दिया है।
जीवदया : मूक प्राणियों के प्रति करुणा और संरक्षण
जीवदया मातृछाया के मूल संस्कारों में समाहित है। जैन दर्शन के अहिंसा और करुणा के सिद्धांतों से प्रेरित संगठन ने पशु-पक्षियों की सेवा, गौसंरक्षण और प्राणी कल्याण के क्षेत्र में निरंतर कार्य किया है।
संगठन ने बेंगलूरु, अहमदाबाद और राजस्थान सहित विभिन्न क्षेत्रों की गौशालाओं को एक से दो वर्षों तक गोद लेकर गायों और अन्य पशुओं के भरण-पोषण का दायित्व निभाया। अनेक गायों को कत्लखानों में जाने से बचाकर सुरक्षित गौशालाओं तक पहुँचाने में भी योगदान दिया।
प्राणी सेवा के क्षेत्र में संगठन के कुछ प्रमुख कार्य हैं—
- श्री महावीर जैन पशु सेवा केंद्र, नेल्लोर: चारे के गोदाम, पशुओं के लिए बड़े पेयजल टैंक और प्रसूति गायों के लिए अलग शेड के निर्माण हेतु लगभग ₹40 लाख का योगदान।
- गौतीर्थ – श्री भगवान महावीर जीव रक्षा धाम: रामसमुद्रा बाँध के निकट, शिडलघट्टा तालुक, चिक्कबल्लापुर में विश्व प्राणी कल्याण मंडल के संस्थापक श्री दयानंदस्वामीजी द्वारा स्थापित इस धाम में 150 × 36 फीट, अर्थात लगभग 4,500 वर्ग फीट के विशाल शेड का निर्माण।
- राजस्थान की गौशालाएँ: 50 गायों के आवास हेतु एक शेड का निर्माण तथा अनेक छोटी-बड़ी गौशालाओं को शेड निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग।
- गौसेवा एवं पशु कल्याण: विभिन्न गौशालाओं के भरण-पोषण और पशुओं की देखभाल के लिए निरंतर सहायता।

इन प्रयासों के माध्यम से मातृछाया ने यह संदेश दिया है कि करुणा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण का भाव है।
मानवसेवा एवं चिकित्सा : पीड़ा में सहारा, जीवन में आशा
मातृछाया का मानना है कि जरूरतमंद व्यक्ति को समय पर सहायता उपलब्ध कराना ही सच्ची मानवसेवा है। इसी भावना से संगठन ने स्वास्थ्य, चिकित्सा और जनकल्याण के क्षेत्र में अनेक सेवाकार्य किए हैं।
स्थापना के आरंभिक वर्षों से ही निःशुल्क स्वास्थ्य जाँच, नेत्र परीक्षण एवं चिकित्सा शिविर, डायलिसिस सहायता, कृत्रिम पैर प्रत्यारोपण और कैंसर जाँच जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं।
संगठन के प्रमुख चिकित्सा एवं मानवसेवा कार्य—
- नेत्र चिकित्सा: अनेक नेत्र जाँच शिविरों के माध्यम से हजारों लोगों को चश्मे उपलब्ध कराए गए तथा आवश्यकता के अनुसार चयनित मरीजों की सर्जरी करवाई गई।
- किडनी डायलिसिस: जरूरतमंद मरीजों के डायलिसिस हेतु स्थापना से अब तक ₹40 लाख से अधिक का आर्थिक सहयोग।
- कोरोना महामारी में सहायता: संकट के कठिन दौर में भी सेवा कार्य जारी रखते हुए रोगियों के उपचार हेतु 10 ऑक्सीजन मशीनों का दान।
- विशेष जरूरतों वाले व्यक्तियों की सहायता: जालोर जिले के आहोर क्षेत्र में स्थित मंदबुद्धि आश्रम को लगभग सात वर्षों में ₹30 लाख का सहयोग।
- कृत्रिम पैर एवं स्वास्थ्य शिविर: जरूरतमंद व्यक्तियों को चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विभिन्न स्वास्थ्य कार्यक्रमों का आयोजन।

इन सेवाओं का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि जरूरतमंदों के जीवन में राहत, आत्मविश्वास और सम्मान की भावना को मजबूत करना है।
शिक्षा : उज्ज्वल भविष्य की ओर एक कदम
मातृछाया का दृढ़ विश्वास है कि शिक्षा प्रत्येक बच्चे का भविष्य संवारने का सशक्त माध्यम है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण किसी विद्यार्थी की पढ़ाई बाधित न हो, इसी उद्देश्य से संगठन जरूरतमंद विद्यार्थियों को शैक्षणिक सहायता प्रदान करता है।
संगठन द्वारा विद्यार्थियों की स्कूल फीस भरने, पुस्तकें एवं स्कूल यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने तथा अन्य आवश्यक शैक्षणिक खर्चों में सहयोग किया जाता है।
इसी क्रम में कर्नाटका वेलफेयर एसोसिएशन फॉर ब्लाइंड के बच्चों के लिए संगीत अभ्यास हेतु लगभग 500 वर्ग फीट के कमरे का निर्माण भी करवाया गया। यह पहल विशेष जरूरतों वाले बच्चों की प्रतिभा को प्रोत्साहित करने और उन्हें अपनी क्षमताओं को विकसित करने के अवसर प्रदान करने की भावना को दर्शाती है।
मातृछाया के लिए शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और बेहतर समाज के निर्माण की नींव है।
साधर्मिक भक्ति : अपने समाज के जरूरतमंदों का संबल

जैन दर्शन में साधर्मिक भक्ति का विशेष महत्व है। इसी भावना से प्रेरित होकर मातृछाया पिछले 15 वर्षों से जरूरतमंद जैन परिवारों की सहायता के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
संगठन द्वारा जरूरतमंद परिवारों को राशन, बच्चों की स्कूल फीस, अस्पताल एवं दवाइयों का खर्च, घर का किराया और आवश्यकतानुसार आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया जाता है।
केवल तात्कालिक सहायता तक सीमित न रहते हुए संगठन ने अनेक जरूरतमंद जैन बंधुओं को रोजगार दिलाने तथा स्वरोजगार के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने का भी प्रयास किया है, ताकि वे आत्मनिर्भर बनकर सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें।
पिछले पाँच वर्षों से संगठन द्वारा लगभग 400 ऐसे लोगों को जैन तीर्थों की यात्रा करवाने का पुनीत कार्य भी किया गया है, जिन्होंने अपने जीवन में पहले कभी जैन तीर्थों के दर्शन नहीं किए थे।
यह पहल धार्मिक आस्था, सामाजिक संवेदना और सामुदायिक सहयोग का सुंदर संगम है।
देवद्रव्य एवं धार्मिक सेवा : धर्मसंरक्षण में योगदान
धार्मिक आस्था और जिनशासन के प्रति श्रद्धा मातृछाया की सेवा-यात्रा का महत्वपूर्ण आधार है। संगठन देवद्रव्य योजना के अंतर्गत जिनालयों और धार्मिक स्थलों के विकास, निर्माण एवं जीर्णोद्धार में भी सहयोग प्रदान करता है।
इस दिशा में संगठन के प्रमुख योगदान हैं—
- सिद्धाचल स्थूलभद्र धाम, देवनहल्ली में दो देवली एवं चाँदी के सिंहासन का निर्माण।
- विभिन्न छोटे तीर्थों और धार्मिक स्थलों के जीर्णोद्धार हेतु आर्थिक सहयोग।
- श्री किलपॉक जैन मंदिर के लिए स्वर्ण संबंधी कार्यों में योगदान।
इसके साथ ही गुरु भगवंतों की वैयावच्च और धार्मिक गतिविधियों में सहयोग संगठन की सेवा भावना का अभिन्न हिस्सा है। इन कार्यों के माध्यम से मातृछाया धार्मिक परंपराओं के संरक्षण और भावी पीढ़ियों तक संस्कारों के संवहन में अपना योगदान दे रहा है।
सेवा के साथ प्रतिभा को पहचान : ‘पहचान’ पहल
सेवा का उद्देश्य केवल जरूरतों को पूरा करना ही नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति में छिपी प्रतिभा को अवसर देना भी है। इसी सोच के साथ ओजस्वी वक्ता एवं प्रतिभाशाली श्रीमती नीलम लालवानी के महत्वपूर्ण सुझाव पर मातृछाया ने जैन समाज की महिलाओं की प्रतिभा को मंच प्रदान करने के लिए ‘पहचान’ पहल की शुरुआत की।
‘पहचान’ ऐसा मंच बना, जहाँ महिलाओं को अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने, अपनी क्षमताओं को निखारने और समाज के सामने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने का अवसर मिला।
इस पहल के माध्यम से अनेक महिलाओं ने अपनी प्रतिभा को अभिव्यक्त किया और सफलता की नई राहें खोजीं। ‘पहचान’ मातृछाया के उस व्यापक दृष्टिकोण का प्रतीक है, जिसमें सेवा के साथ महिला सशक्तीकरण, आत्मविश्वास और रचनात्मक विकास को भी समान महत्व दिया जाता है।
एक छोटी शुरुआत से देशव्यापी परिवार तक
मात्र ₹100 की दानराशि से आरंभ हुई मातृछाया की यह यात्रा आज एक विशाल सेवा परिवार का स्वरूप ले चुकी है। संगठन से देशभर में 1,300 से अधिक महिलाएँ जुड़ी हुई हैं, जो सेवा, समर्पण और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से प्रेरित हैं।
विभिन्न क्षेत्रों में किए गए सेवाकार्यों के माध्यम से मातृछाया ने अपनी पहचान देश के साथ-साथ विदेशों तक भी पहुँचाई है। समय के साथ संगठन ने नई पीढ़ी की प्रतिभाशाली महिलाओं को नेतृत्व के अवसर प्रदान किए हैं, जिससे इसकी सेवा-यात्रा नई ऊर्जा और नए विचारों के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है।
मातृछाया की शक्ति केवल इसके सदस्यों की संख्या में नहीं, बल्कि उन असंख्य सेवाभावी प्रयासों में निहित है, जो किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, किसी विद्यार्थी को शिक्षा जारी रखने का अवसर देते हैं, किसी मरीज को उपचार में सहारा प्रदान करते हैं और किसी मूक प्राणी को सुरक्षित जीवन दिलाने में सहयोग करते हैं।
मातृछाया की भावी योजना : संवेदना से साकार होगा एक नया आश्रय
सेवा की इस प्रेरणादायी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए मातृछाया जैन महिला संगठन की भावी योजनाओं में बेंगलूरु के बाहरी क्षेत्र में एक अत्याधुनिक वृद्धाश्रम का निर्माण करना प्रमुख है।
यह वृद्धाश्रम उन बुजुर्गों और असहाय व्यक्तियों के लिए सुरक्षित, स्नेहपूर्ण एवं सम्मानजनक आश्रय उपलब्ध कराने की परिकल्पना है, जिन्हें जीवन के इस पड़ाव पर देखभाल, अपनत्व और सहारे की आवश्यकता है।
प्रस्तावित वृद्धाश्रम में आधुनिक सुविधाओं के साथ ऐसा वातावरण विकसित करने की योजना है, जहाँ निवासियों को शारीरिक सुविधाओं के साथ मानसिक शांति, आध्यात्मिक संतोष और पारिवारिक आत्मीयता का अनुभव हो सके।
इसमें निम्न सुविधाओं की परिकल्पना की गई है—
- आरामदायक लिविंग रूम एवं शयनकक्ष।
- विशाल एवं सुव्यवस्थित सामूहिक भोजन कक्ष।
- शांत एवं पवित्र मंदिर।
- प्रार्थना और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए विशेष कक्ष।
- हरियाली से युक्त सुंदर उद्यान।
- पशुसेवा एवं गौसंरक्षण के लिए सुव्यवस्थित गौशाला।
यह केवल एक भवन निर्माण की योजना नहीं, बल्कि ऐसा सेवा-धाम स्थापित करने का संकल्प है, जहाँ बुजुर्गों और असहाय व्यक्तियों को सुरक्षा, सम्मान, आत्मीयता और आध्यात्मिक शांति प्राप्त हो सके।
हमारा संकल्प
मातृछाया जैन महिला संगठन की यात्रा इस विश्वास का प्रमाण है कि सेवा के लिए बड़े संसाधनों से अधिक आवश्यक है एक बड़ा हृदय, दृढ़ संकल्प और निस्वार्थ भावना।
₹100 से शुरू हुआ यह अभियान आज हजारों जीवनों को स्पर्श करने वाली प्रेरणा बन चुका है। प्रत्येक सेवा कार्य संगठन के उस मूल भाव को साकार करता है, जिसमें जीवमात्र के प्रति करुणा, जरूरतमंदों के प्रति संवेदना, धर्म के प्रति श्रद्धा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व समाहित है।
मातृछाया का उद्देश्य केवल सहायता पहुँचाना नहीं, बल्कि आशा जगाना, आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करना और समाज में सेवा एवं करुणा की संस्कृति को मजबूत बनाना है।
क्योंकि जहाँ करुणा है, वहाँ सेवा है; जहाँ सेवा है, वहाँ समर्पण है; और जहाँ समर्पण है, वहीं मातृछाया है।


